Monday, April 18, 2011

महापुरूषों का जीवन निर्मल होता है : सुभद्र मुनि

सिरसा,(थ्री स्टार): जो पल व्यतीत हो जाता है वह पुन: लौटकर नहीं आता। नैतिक एवं धर्ममय जीवन-यात्रा सार्थक है। अनैतिक एवं अधर्म यात्रा से जीवन निष्फल हो जाता है। यह उद्गार जैनाचार्य श्री सभुद्र मुनि जी महाराज ने श्री महावीर कथा के पांचवें दिन जैन स्थानक सिरसा में व्यक्त किए। आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति सोचता है कि बढ़ रहा हूं लेकिन पल-पल जिंदगी घट रही है। जीव अकेला आता है और मोह-माया-तृष्णा में फंस जाता है। भगवान महावीर, भगवान श्री कृष्ण अथवा भगवान श्रीराम जैसे महापुरूष सहज और सरल जीवन व्यतीत करते हैं। वे अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते। उनके ज्ञान को केवल ज्ञानी अर्थात भक्त ही जान पाते हैं। आचार्य श्री ने बताया कि पौराणिक काल में सती प्रथा, दास प्रथा और बलि प्रथा आदि सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए प्रभु ने धर्म का मार्ग दिखाया। धर्म नाममात्र भी स्वार्थ, हिंसा एवं असत्य में नहीं है। आचार्य श्री ने भगवान महावीर के यौवन पराक्रम एवं पुरूषार्थ पर चर्चा की और युवाओं को शक्ति का सदुपयोग करने का आह्वान किया। इस अवसर पर संघ प्रवर्तिनी महासाध्वी सुशीला जी, साध्वी रत्न सुनीता जी ने भगवान के सिद्धान्तों को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में महिला संघ, युवक मंडल, जैन समाज के सदस्यों ने सामूहिक रूप से गुरदेव जी रामकृष्ण जी महाराज की स्मृति में नमोकार महामंत्र अखण्ड जाप प्रारम्भ किया। इस अवसर पर जैन सभा के प्रवक्ता ललित जैन, प्रेमी जैन, वेदप्रकाश जैन, जनक जैन, वीरेन्द्र जैन, नेमचन्द जैन, दलीप जैन, नरसिंहदास बांसल, रिशभ जैन, नितिन जैन सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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