प्रेम के वश में होकर प्रभु अवतार लेते हैं: स्वामी नित्यानन्द
सिरसा,(थ्री स्टार): परमात्मा प्रेम के लिए निराकार से साकार होते हैं। परमात्मा भाव और प्रेम के भूखे हैं। प्रेम के लिए परमात्मा छोटे बन जाते हैं और नीचे उतर आते हैं। नीचे उतरना ही परमात्मा का अवतार है। वो हमारे बराबर बनकर, हमारे जैसे बनकर हमारे बीच आते हैं ताकि हम उन्हें जान सकें, प्रेम कर सकें। भक्तों ने प्रार्थना की कि प्रभु, हम लोग संसारी जीव हैं आप तक नहीं पहुंच सकते, अत: कृपा करके आप ही नीचे उतर आइए। आप एक हैं हम अनेक हैं। हम एक-एक करके कब तक ऊपर चढ़ेंगे। हम लोग एक-एक करके आपसे मिलें तो इसमें कितना समय बीत जाएगा? इसलिए प्रभु, आप अकेले ही नीचे उतर आएं तो हम सब एक साथ कृतार्थ हो जाएंगे। संस्कृत में पीढ़ी (पौड़ी) को अवतरणिका कहते हंै, तो प्रभु आप अपनी कृपा रूपी, भक्ति रूपी सीढ़ी से नीचे उतर कर हमारे जैसे बनकर (साकार) आ जाइए। यह विचार जिले के गांव फूलकां में चल रही भव्य रामकथा के दौरान स्वामी सदाशिव नित्यानंद गिरी जी महाराज ने व्यक्त किए। स्वामी जी ने बताया कि निर्गुण-निराकार परमात्मा कौशल्य की गोद में नहीं खेल सकते। शबरी के जूठे बेर नहीं खा सकते, प्रभु केवट की नौका में नहीं बैठ सकते, विदुरानी के घर छिलके नहीं खा सकते व गोपियों का माखन नहीं खा सकते। इन सबके लिए प्रभु को साकार रूप में आना ही पड़ता है। निराकार परमात्मा में भक्तों का उनके प्रति प्रेम नहीं हो पाता, उनको तो केवल बोध ही हो सकता है लेकिन जब प्रभु साकार होकर आते हंै तब मनुष्य तो क्या गाय, वृक्ष और पशु-पक्षी तक भी उनसे प्रेम करते हैं और सभी कृतार्थ हो जाते हंै। परमात्मा से प्रेम गौ-सेवा से, परोपकार से, सत्संग से, सांसारिक विकारों के मिटने से जागृत हो पाता है। संसार का मोह मिटता है निष्काम भाव से सेवा करने से, भगवान को अपना मानने से, भगवान मेरे हैं इस भाव से भक्ति करने से और भक्तों-संतों का सत्संग करने से। स्वामी जी ने आगे बताया कि भगवान अपने माता-पिता अर्थात् दशरथ-कौशल्या की सेवा करते हुए मानो यह संदेश देते हंै कि माता-पिता की सेवा से ही मैं प्राप्त होता हूं। जो भाई माता-पिता का तिरस्कार करते हंै और जो बहने बूढ़े सास-ससुर का अपमान करती हंै भगवान उन पर कभी कृपा नहीं करते। माता भगवान का रूप हंै, अत: माता का दिल कभी नहीं दुखाना चाहिए। सेवाभावी स्वभाव बनाना ही भगवा की पहली भक्ति है। स्वभाव बदलने लगे तो समझो जीवन में भक्ति का समावेश हो रहा है और बिगडऩे लगे तो समझो कि हम भगवान से दूर जा रहे हैं। परमात्मा सभी के हृदय में निवास करते हैं। अत: किसी का भी अहित करने से परमात्मा नाराज होते हैं। स्वामी जी ने कथा के दौरान आगे बताया कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण विश्वामित्र जी के साथ जाते हैं। रास्ते में ताड़का का वध करते हैं। इसी प्रकार जीवन का अज्ञान ही ताड़का है। पहले भगवान अज्ञान रूपी अंधकार को भक्तों के हृदय से नष्ट करते हैं फिर अहंकार व आसक्ति रूपी सुबहू व मरीच रूपी दुर्गुणों को समाप्त करते हैं। इसके बाद प्रभु श्री राम पत्थर बनी हुई अहिल्या का उद्धार करते हंै। विषयी जीव जड़ है पत्थर की तरह हो जाता है। भगवान से दूर होते ही जीव में जड़ता, अज्ञानता, पाषाणता और पशुता आ जाती है। विषयों में आसक्त हो भगवान को भूलना ही पत्थर होना है लेकिन यदि भगवान का आश्रय हो तो जड़-विषयी, अज्ञानी जीव का भी उद्धार हो जाता है।
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